V P Singh Biography In Hindi

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V P Singh Biography

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 वी.पी. सिंह का प्रारंभिक जीवन

राजा बहादुर राम गोपाल सिंह के पुत्र श्री वी.पी. सिंह का जन्म 25 जून 1931 को इलाहाबाद में हुआ था।

उन्होंने इलाहाबाद एवं पूना विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। 25 जून 1955 को श्रीमती सीता कुमारी से उनका विवाह हुआ एवं उनके दो बेटे हैं।

विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपने विद्यार्थी जीवन में ही राजनीति से दिलचस्पी हो गई थी। वह समृद्ध परिवार से थे, इस कारण युवाकाल की राजनीति में उन्हें सफलता प्राप्त हुई।

उनका सम्बन्ध भारतीय कांग्रेस पार्टी के साथ हो गया। 1969-1971 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुँचे।

उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का कार्यभार भी सम्भाला। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 9 जून 1980 से 28 जून 1982 तक ही रहा।

इसके पश्चात्त वह 29 जनवरी 1983 को केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह राज्यसभा के भी सदस्य रहे।

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31 दिसम्बर 1984 को वह भारत के वित्तमंत्री भी बने। भारतीय राजनीति के परिदृश्य में विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय वित्तमंत्री थे जब राजीव गांधी के साथ में उनका टकराव हुआ।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास यह सूचना थी कि कई भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा करवाया गया है।

इस पर वी. पी. सिंह अर्थात् विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अमेरिका की एक जासूस संस्था फ़ेयरफ़ैक्स की नियुक्ति कर दी ताकि ऐसे भारतीयों का पता लगाया जा सके।

वी पी सिंह की पढाई की शुरुवात देहरादून के कैंब्रिज स्कूल से हुई थी. आगे का   अध्ययन इलाहाबाद से पूरा किया, फिर इसके बाद पूना में पुणे यूनिवर्सिटी से पढाई की .

पढाई के समय से ही इन्हें राजनीति में रुझान रहा, वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज के ये स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट रहे, इसके अलावा इलाहबाद यूनिवर्सिटी के ये वाईस प्रेसिडेंट थे.

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वी पी सिंह को कविताये लिखने का काफी शौक था, इसलिए इन्होने कई किताबे भी लिखी.

वी पी सिंह ने छात्र काल में बहुत से आन्दोलन किये और उनका नेतृत्व सम्भाला, इसलिए इनका सत्ता के प्रति प्रेम बढ़ता गया.

यह एक समृध्द परिवार से थे, पर इन्हें धन दौलत से इतना प्रेम ना था, देश प्रेम के चलते इन्होने भी भूदान में अपनी  सारी सम्पति दान करी दी और परिवार ने इनसे नाता तौड़ दिया.

वी पी सिंह ने 1969 में एक सदस्य के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी में सदस्यता ली.

यह एक कुशल राजनीतिज्ञ थे ,1969 में उत्तरप्रदेश की विधानसभा के सदस्य बनाये गए, इस वक्त यह काँग्रेस के नेता थे.

1971 में निचली संसदीय लोकसभा का चुनाव जीता. 1974 में इन्दिरा गाँधी ने इन्हें केंद्रीय वाणिज्य उप मंत्री बना दिया.

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वी पी सिंह ने 1976-1977 तक इस पद को संभाला. 1980 में ये लोकसभा के सदस्य भी बन गए. 1980 में जनता दल की सरकार गिरने के बाद जब इन्दिरा वापस सत्ता में आई, उस वक्त वी पी सिंह को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर आनंद कुमार ने बताया  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री या केंद्र में वित्त मंत्री रहते हुए आरक्षण के बारे में उनके विचार नहीं बने थे.

रामधन, रामविलास पासवान और शरद यादव जैसे समाजवादी पृष्ठभूमि के नेताओं के साथ मिलकर जब उन्होंने जनमोर्चा बनाया.

तब उन्हें मंडल आयोग की सिफारिशों का महत्व मालूम हुआ. उन्होंने कहा कि जिस समय मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया गया  वह समय उसके हिसाब से सही नहीं था.

दरअसल, चौधरी देवी लाल के साथ हुए विवाद के बाद वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को जल्द लागू कर दिया.

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लेकिन, इतना जरूर है कि इसके फलस्वरूप आज पिछड़े वर्गों को जो 27 प्रतिशत आरक्षण मिला है उसके लिए देश उन्हें हमेशा याद करेगा.

एक बार वीपी सिंह ने मंडल के मुद्दे पर खुद कहा था ‘गोल करने में मेरा पांव जरूर टूट गया, लेकिन गोल तो हो गया.’

विश्वनाथ प्रताप सिंह पर ‘मंजिल से ज्यादा सफर’ नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने बताया जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो उनसे दो तरह की उम्मीद की गई थी.

पहला यह कि जनता पार्टी ने जो गलतियां की वह गलती यह सरकार नहीं करेगी. और दूसरी यह कि यह सरकार साफ-सुथरी तथा भ्रष्टाचार मुक्त रहेगी.’

वी.पी. सिंह के बारे में यह कहा जा सकता है कि वे इस गरीब देश के लिए सही नेता थे।राजा नहीं, फकीर थे वे।वे पिछड़ों के हमदर्द थे।

उनमें व्यक्तिगत ईमानदारी व त्याग इतना अधिक था कि उनके नाम पर कसमें खाई जा सकती हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि वे कम ही दिनों तक प्रधान मंत्री रहेे।

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इस देश की मुख्य समस्या हर स्तर पर सरकारी भ्रष्टाचार ही है। बाकी अधिकतर समस्याएं तो भ्रष्टाचार के कारण ही पैदा होती रहती हैं।

वी.पी.सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर व्यक्ति यदि आज भी प्रधान मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए तो देश का आधा सरकारी भ्रष्टाचार वैसे ही खत्म हो जाएगा।

मन मोहन सिंह खुद तो ईमानदार हैं,पर भ्रष्टाचार के खिलाफ तनिक भी कठोर नहीं हैं। पहले बोफर्स घोटाले पर उनकी भूमिका की चर्चा कर ली जाए।

अस्सी के दशक में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से हटने के बाद वी.पी.सिंह जन मोर्चा बना कर देश भर में राजीव सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रहे थे।

उसी सिलसिले में वे पटना आए थे।वे बेली रोड के हड़ताली मोड के पास एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।जनसत्ता के संवाददाता के रूप में इन पंक्तियों का लेखक भी उस सभा में मौजूद था।

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वे सहा और सरल स्वभाव के थे। फिर भी उनका व्यक्ितत्व जटिल था। वे एक प्रकार की अनबूझ पहेली थे।

वे प्राय: अपनी समस्याओं से खुद जूझना चाहते थे। कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने में या कोई अहम बयान देने के पहले वे सहकर्मियों से हटकर अपने में ही लीन हो जाते थे।

इसलिए जिन पांच प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मुझे मौका मिला, उनमें से मैंने वी. पी. सिंह को सबसे अधिक पहुंच के परे पाया।

लोकप्रिय जननेता होने के बावजूद भी वी. पी. सिंह अंतमरुखी थे। शायद उनमें जो एक कवि और चित्रकार छिपा था, उसी ने उनको अंतमरुखी बना दिया था।

स्वास्थ्य के कारण सक्रिय दलगत राजनीति से हटने के बाद, उनकी ये प्रतिभाएं पूर्णरूप से मुखरित और साकार हुईं।

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उनकी कविताओं की विशेषता थी : विचारों की विलक्षणता, समाज और राजनैतिक व्यवस्था के प्रति सूक्ष्म व्यंग्य, ‘नावक के तीर’ की तरह असर करने वाली सूक्ितयां।

वी. पी. सिंह का एक महान गुण था उनकी निर्भीकता। भ्रष्टाचार-विरोधी अपने अभियान में उन्होंने उद्योग एवं व्यापार जगत के भारी भरकम हस्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की थी।

उसी प्रकार राष्ट्रहित में द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संधिवार्ता में उन्होंने महानतम शक्ितयों के दबाव की भी उपेक्षा कर दी तथा भारत के निर्धारित दृष्टिकोण पर अटल रहे थे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिला उरुग्वे के पुंटा डेल एस्टे शहर में हुए गैट वार्तालाप में।

वहां अमेरिका और अन्य पाश्चात्य देशों के सभी दबाव के बावजूद भी, उन्होंने सेवाओं तथा बौद्धिक सम्पदा के मसले पर भारत के हितों का समर्पण नहीं किया।

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1983 में फिर से उनकी नियुक्ती मिनिस्टर ऑफ़ कॉमर्स के पद पर की गयी थी। इसके बाद 1989 के चुनाव में सिंह की वजह से ही बीजेपी राजीव गाँधी को गद्दी से हटाने में सफल रही थी।

1989 में उनके द्वारा निभाए गए महत्वपूर्ण रोल के लिए वे हमेशा भारतीय राजनीती में याद किये जाते है।

कहा जाता है की 1989 के चुनाव देश में बहुत बड़ा बदलाव लेकर आए थे और इसी चुनाव में उन्होंने प्रधानमंत्री बनकर दलित और छोट वर्ग के लोगो की सहायता की।

सिंह एक निडर राजनेता थे, दुसरे प्रधानमंत्रीयो की तरह वे कोई भी निर्णय लेने से पहले डरते नही थे बल्कि वे निडरता से कोई भी निर्णय लेते थे और ऐसा ही उन्होंने लालकृष्ण आडवानी के खिलाफ गिरफ़्तारी का आदेश देकर किया था। प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार का भी विरोध किया था।

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 वी.पी. सिंह की मृत्यू

वीपी सिंह नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल में निधन हुआ। इससे पहले गुर्दे और हृदय की समस्याओं से पीड़ित वीपी सिंह को बॉम्बे अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में भर्ती कराया गया था।

76 वर्षीय सिंह के गुर्दे और दिल की बीमारियों का इलाज चल रहा था। आम तौर पर उनका नई दिल्ली स्थित अपोलो अस्पताल में या मुंबई के बॉम्बे अस्पताल में डायलिसिस होता था।

वे सन 1991 से ब्लड कैंसर जैसी बीमारी से भी जूझ रहे थे मगर इसके बावजूद उन्होंने सक्रिय राजनीतिक जीवन नहीं छोड़ा।

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वीपी सिंह एक राजनेता होने के अलावा संवेदनशील कवि और चित्रकार के रूप में भी जाने जाते थे।

उनके कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और कई कला प्रदर्शिनियों में उनकी बनाई तस्वीरें भी सराही गई थीं।

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